अर्जें तलब से दिल मेरा लाचार क्या करूं,
मुझको गुलों का शौक उसे खार क्या करूं।
अब और क्या ज़माने को दूंगा सुबूते इश्क,
मैं हूँ खमोशियों का कलाकार क्या करूँ।
लड़ने को तेरे वास्ते तैयार हूँ मगर,
अपने खड़े है सामने तो वार क्या करूं।
इल्ज़ाम नागवार है सारे मुझे सनम,
नाकर्दा जुर्म का हूँ गुनहगार क्या करूं।
माइल बहुत था इश्क में फूलो सा हो सिला ,
लेकिन मिले हैं किस्मतों से खार क्या करूं।
इक रोज भी तो आप करें ख़त्म तिश्नगी,
मिलता नही गो शर्बते दीदार क्या करूं।
फ़ुर्क़त में आपसे न फ़राहम हुआ सुकूँ,
अपनी तरह से आप करें प्यार क्या करूं ।
आई न रास मुझको ये तरतीबे ज़िन्दगी,
आवारगी का था मैं तलबगार क्या करूं।
-रवि शुक्ल बीकानेर
मुझको गुलों का शौक उसे खार क्या करूं।
अब और क्या ज़माने को दूंगा सुबूते इश्क,
मैं हूँ खमोशियों का कलाकार क्या करूँ।
लड़ने को तेरे वास्ते तैयार हूँ मगर,
अपने खड़े है सामने तो वार क्या करूं।
इल्ज़ाम नागवार है सारे मुझे सनम,
नाकर्दा जुर्म का हूँ गुनहगार क्या करूं।
माइल बहुत था इश्क में फूलो सा हो सिला ,
लेकिन मिले हैं किस्मतों से खार क्या करूं।
इक रोज भी तो आप करें ख़त्म तिश्नगी,
मिलता नही गो शर्बते दीदार क्या करूं।
फ़ुर्क़त में आपसे न फ़राहम हुआ सुकूँ,
अपनी तरह से आप करें प्यार क्या करूं ।
आई न रास मुझको ये तरतीबे ज़िन्दगी,
आवारगी का था मैं तलबगार क्या करूं।
-रवि शुक्ल बीकानेर
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